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भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता: डीपीडीपी अधिनियम और सूचना प्रौद्योगिकी नियम बने प्रमुख मुद्दे

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Photo by Action Construction Equipment Ltd. - ACE via Pexels

भारत और अमेरिका के बीच चल रही व्यापार वार्ताओं में डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (डीपीडीपी) अधिनियम और सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) नियमों के प्रावधान केंद्र बिंदु बन गए हैं। वाशिंगटन का मानना है कि इन नियमों की कुछ विशिष्ट धाराएं अमेरिकी टेक कंपनियों के लिए गैर-तरफावटी बाधाएं (नॉन-टैरिफ बैरियर्स) का काम कर सकती हैं, जिससे द्विपक्षीय व्यापार संबंधों पर नए सिरे से बातचीत की आवश्यकता पैदा हुई है। यह मुद्दा न केवल आर्थिक सहयोग बल्कि डेटा संप्रभुता और डिजिटल नीति के वैश्विक मानकों को भी प्रभावित करता है।

भारत-अमेरिका व्यापार वार्ताओं का वर्तमान परिदृश्य

हाल के वर्षों में, भारत और अमेरिका के बीच व्यापार और निवेश को बढ़ावा देने के लिए कई महत्वपूर्ण वार्ताएं हुई हैं। इन वार्ताओं का उद्देश्य द्विपक्षीय आर्थिक साझेदारी को मजबूत करना है। हालांकि, डिजिटल अर्थव्यवस्था और डेटा गवर्नेंस से जुड़े मुद्दे अब इन चर्चाओं का एक प्रमुख हिस्सा बन गए हैं। बिजनेस स्टैंडर्ड की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में लागू किए गए डीपीडीपी अधिनियम और सूचना प्रौद्योगिकी नियम इन वार्ताओं में विशेष रूप से चर्चा का विषय बने हुए हैं। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (यूएसटीआर) के अधिकारियों ने हाल ही में भारत का दौरा किया और अमेरिकी टेक कंपनियों से 'अमेरिका फर्स्ट' रणनीति का पालन करने का आग्रह किया, साथ ही उन भारतीय नियमों पर चिंता जताई जिन्हें वे अमेरिकी कंपनियों के प्रति भेदभावपूर्ण मानते हैं।

डीपीडीपी अधिनियम: अमेरिकी कंपनियों की मुख्य चिंताएं

डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (डीपीडीपी) अधिनियम, 2023 भारत का डेटा संरक्षण कानून है, जिसका उद्देश्य व्यक्तियों के व्यक्तिगत डेटा की प्रोसेसिंग को विनियमित करना है। इस अधिनियम में कई ऐसे प्रावधान शामिल हैं जो वैश्विक कंपनियों, विशेष रूप से अमेरिकी टेक दिग्गजों के लिए चिंता का विषय बने हुए हैं:

  • डेटा स्थानीयकरण आवश्यकताएं: कुछ मामलों में संवेदनशील डेटा को भारत के भीतर ही संग्रहीत करने का प्रस्ताव।
  • डेटा ट्रांसफर पर प्रतिबंध: विदेशों में डेटा के हस्तांतरण पर सख्त शर्तें।
  • उल्लंघनों के लिए भारी जुर्माना: नियमों का पालन न करने पर कंपनियों पर लगाए जाने वाले वित्तीय दंड।

अमेरिकी प्रतिनिधियों का तर्क है कि ये प्रावधान अमेरिकी कंपनियों के लिए अतिरिक्त संचालन लागत और कानूनी जोखिम पैदा करते हैं, जिससे उनकी प्रतिस्पर्धात्मकता प्रभावित हो सकती है। वे इन्हें गैर-तरफावटी बाधाएं मानते हैं जो मुक्त और निष्पक्ष व्यापार के सिद्धांतों के विपरीत हैं।

सूचना प्रौद्योगिकी नियमों पर विवाद के बिंदु

सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) नियम, 2021 विशेष रूप से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और डिजिटल मीडिया को विनियमित करने पर केंद्रित हैं। इन नियमों के कुछ प्रमुख विवादास्पद पहलू जो भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता को प्रभावित कर रहे हैं, उनमें शामिल हैं:

  • सोशल मीडिया के लिए increased गणनीयता: प्लेटफॉर्म्स को उनकी सामग्री के लिए अधिक जिम्मेदार ठहराया जाना।
  • सामग्री हटाने के लिए त्वरित अनुपालन आदेश: अधिकारियों द्वारा जारी किए गए आदेशों का तेजी से पालन करना।
  • एक स्थानीय संपर्क अधिकारी की नियुक्ति: भारत में एक भौतिक प्रतिनिधि होना अनिवार्य है।

अमेरिकी पक्ष का मानना है कि ये आवश्यकताएं कंपनियों की स्वायत्तता में हस्तक्षेप करती हैं और उनके लिए एक अतिरिक्त बोझ का काम कर सकती हैं, जो संभावित रूप से बाजार में उनकी भागीदारी को हतोत्साहित करती हैं।

गैर-तरफावटी बाधाओं का अमेरिकी दृष्टिकोण

विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के ढांचे के तहत, गैर-तरफावटी बाधाएं ऐसे उपाय हैं जो सीमा शुल्क (टैरिफ) के अलावा व्यापार को प्रतिबंधित या विकृत करते हैं। अमेरिका का दावा है कि डीपीडीपी अधिनियम और आईटी नियमों के कुछ पहलू इसी श्रेणी में आते हैं। उनका तर्क है कि ये नियम, हालांकि घरेलू नीति उद्देश्यों के लिए बनाए गए हैं, लेकिन वे अप्रत्यक्ष रूप से विदेशी फर्मों, विशेष रूप से अमेरिकी फर्मों के लिए बाजार में प्रवेश और संचालन को कठिन बना सकते हैं। यह दृष्टिकोण अमेरिकी सरकार की व्यापक 'अमेरिका फर्स्ट' रणनीति से जुड़ा हुआ है, जिसका लक्ष्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिकी व्यापार हितों की रक्षा करना है।

भारत का रुख: डेटा संप्रभुता और नागरिक अधिकार

भारत सरकार ने इन चिंताओं के जवाब में स्पष्ट किया है कि डीपीडीपी अधिनियम और आईटी नियम देश की डिजिटल संप्रभुता सुनिश्चित करने और अपने नागरिकों के डेटा और अधिकारों की रक्षा करने की आवश्यकता से तैयार किए गए हैं। भारत का तर्क है कि ये कानून भेदभावपूर्ण नहीं हैं बल्कि सभी कंपनियों, चाहे वे घरेलू हों या अंतर्राष्ट्रीय, पर समान रूप से लागू होते हैं। भारतीय रुख के प्रमुख आधार हैं:

  • नागरिकों की गोपनीयता का अधिकार: डेटा संरक्षण एक मौलिक अधिकार है।
  • राष्ट्रीय सुरक्षा हित: महत्वपूर्ण डेटा का स्थानीयकरण सुरक्षा चिंताओं को दूर करने के लिए आवश्यक हो सकता है।
  • एक निष्पक्ष डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण: सभी हितधारकों के लिए एक न्यायसंगत और पारदर्शी वातावरण बनाना।

भारत ने यह भी संकेत दिया है कि वह व्यापार वार्ताओं के दौरान रचनात्मक संवाद के लिए तैयार है, लेकिन अपने नीतिगत स्थान को छोड़े बिना।

व्यापार वार्ताओं पर संभावित प्रभाव

इन नियमों पर चल रहा तनाव भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों के भविष्य को प्रभावित कर सकता है। यदि मतभेद हल नहीं होते हैं, तो इसके निम्नलिखित परिणाम हो सकते हैं:

  • व्यापार तनाव में वृद्धि: दोनों देशों के बीच व्यापारिक रिश्तों में खिंचाव आ सकता है।
  • निवेश निर्णयों पर प्रभाव: अमेरिकी कंपनियां भारत में नए निवेश पर पुनर्विचार कर सकती हैं।
  • व्यापक आर्थिक साझेदारी पर असर: रणनीतिक आर्थिक सहयोग के अन्य क्षेत्र प्रभावित हो सकते हैं।

हालाँकि, एक सकारात्मक नोट पर, यह विवाद दोनों देशों के लिए डेटा गवर्नेंस और डिजिटल व्यापार पर सामान्य मैदान तलाशने का एक अवसर भी प्रस्तुत करता है।

मुख्य बातें (Key Takeaways)

  1. डीपीडीपी अधिनियम और आईटी नियम भारत-अमेरिका व्यापार वार्ताओं के केंद्र में हैं।
  2. अमेरिका इन नियमों के कुछ प्रावधानों को अमेरिकी कंपनियों के लिए गैर-तरफावटी बाधाएं मानता है।
  3. भारत का जोर डेटा संप्रभुता और नागरिकों की गोपनीयता के अधिकार पर है।
  4. यह मुद्दा व्यापक व्यापार संबंधों और द्विपक्षीय निवेश को प्रभावित कर सकता है।
  5. दोनों पक्ष रचनात्मक बातचीत के लिए तैयार हैं, लेकिन अपने-अपने सिद्धांतों पर अडिग हैं।
  6. परिणाम भविष्य में डिजिटल व्यापार पर वैश्विक मानकों को आकार दे सकता है।

व्यवहारिक कार्यान्वयन: कंपनियों के लिए मार्गदर्शन

भारत में काम करने वाली अंतरराष्ट्रीय कंपनियों, विशेष रूप से अमेरिकी कंपनियों के लिए, इन नियमों के अनुपालन की तैयारी शुरू करना महत्वपूर्ण है। यहां कुछ व्यावहारिक कदम बताए गए हैं:

  • कानूनी समीक्षा: कंपनियों को डीपीडीपी अधिनियम और आईटी नियमों की विस्तृत कानूनी समीक्षा करनी चाहिए ताकि उन पर लागू होने वाले विशिष्ट दायित्वों को समझा जा सके।
  • डेटा गवर्नेंस फ्रेमवर्क को अपनाना: मजबूत डेटा संरक्षण नीतियों और डेटा प्रोसेसिंग प्रोटोकॉल को लागू करना आवश्यक है।
  • स्थानीय अनुपालन टीम: भारत में एक dedicated अनुपालन टीम या स्थानीय संपर्क अधिकारी नियुक्त करना फायदेमंद हो सकता है।
  • सरकार के साथ जुड़ाव: नीति निर्माताओं के साथ निरंतर संवाद बनाए रखना चाहिए ताकि चिंताओं को उठाया जा सके और नियमों के कार्यान्वयन को समझा जा सके।
  • जोखिम आकलन: इन नियमों के उल्लंघन से जुड़े वित्तीय और प्रतिष्ठात्मक जोखिमों का आकलन करें।

भविष्य की दिशा और निष्कर्ष

भारत-अमेरिका व्यापार वार्ताओं में डीपीडीपी अधिनियम और सूचना प्रौद्योगिकी नियमों पर चल रही बहस दो प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के बीच डिजिटल युग में व्यापारिक संबंधों को संतुलित करने की जटिल चुनौती को उजागर करती है। जहां अमेरिका मुक्त व्यापार और अपनी कंपनियों के हितों की वकालत करता है, वहीं भारत अपनी डिजिटल संप्रभुता और नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा पर जोर दे रहा है। आगे का रास्ता संवाद और सहयोग पर निर्भर करेगा। एक संतुलन ढूंढना, जो डेटा सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए नवाचार और व्यापार को भी बढ़ावा दे, दोनों देशों के लिए एक साझा लक्ष्य होना चाहिए। इन वार्ताओं का परिणाम न केवल द्विपक्षीय संबंधों बल्कि डेटा गवर्नेंस के भविष्य के वैश्विक ढांचे को भी प्रभावित करेगा।

सन्दर्भ:

  1. https://www.business-standard.com/economy/news/india-us-trade-talks-dpdp-act-information-technology-rules-dominate-125121201133_1.html
  2. https://indianexpress.com/article/business/follow-america-first-strategy-visiting-ustr-officials-told-us-tech-companies-10417718/

References

Note: Information from this post can have inaccuracy or mistakes.

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